
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: बस्ती में ‘एप्सटीन’ कांड जैसा धमाका! ‘लोकआंतो’ के पन्नों में दफन हैं कई सफेदपोशों के काले राज
बस्ती मंडल | ब्यूरो रिपोर्ट
- कलम का वार, भ्रष्टाचारियों की चीख: ‘लोकआंतो’ के पन्नों में कैद हैं बस्ती के कई ‘माननीयों’ के काले कारनामे।
- नकाब उतरने का वक्त आया: सरकारी धन डकारने वाले और ‘सप्लाई’ के शौकीनों की उल्टी गिनती शुरू।
- चोर की दाढ़ी में तिनका: खबर से तिलमिलाए बस्ती के ‘कथित’ समाजसेवी, पत्रकार को कोसने से नहीं छुपेंगे पाप।
- सुनो बस्ती के ‘लुटेरों’! पत्रकार दलाल नहीं, तुम्हारी काली करतूतों का काल है।
- एफआईआर और चार्जशीट का खौफ: ‘लोकआंतो’ वेबसाइट के ‘आकाओं’ की रात की नींद उड़ी।
- बस्ती का ‘ब्लैक बॉक्स’ है ‘लोकआंतो’: जिस दिन खुला राज, उस दिन खाकी और खादी दोनों होंगे शर्मसार!
- कौन है ‘लोकआंतो’ का असली मास्टरमाइंड? पत्रकार की लेखनी ने सफेदपोशों के खेमे में लगाई आग।
- मौत का डर और बदनामी की धमकी: क्या सच दबा पाएंगे बस्ती के करोड़ों की निधि डकारने वाले ‘चोर’?
बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में इन दिनों एक ऐसी खामोश बेचैनी है, जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले महसूस होती है। जिस तरह अमेरिका में ‘जेफ्री एप्सटीन’ की फाइलों ने दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों के चेहरों से नकाब हटा दिया था, ठीक वैसी ही आहट अब बस्ती की गलियों में सुनाई दे रही है। चर्चा है ‘लोकआंतो’ नाम की उस फाइल की, जिसमें दफन राज अगर बाहर आए, तो जिले के कई तथाकथित ‘बड़े’ और ‘माननीय’ भगोड़े नजर आएंगे।जिस तरह ‘एप्सटीन’ की फाइलों ने सात समंदर पार तक रसूखदारों के चेहरों से नकाब उतार दिए थे, ठीक वैसी ही सुगबुगाहट अब बस्ती मंडल की गलियों में भी तैर रही है। फर्क बस इतना है कि यहाँ मामला ‘लोकआंतो’ जैसी वेबसाइट्स और पर्दे के पीछे चलने वाले घिनौने खेल का है। आज जो लोग खुद को सफेदपोश समाजसेवी बताकर सीना तानकर घूम रहे हैं, वे जान लें कि पत्रकार की कलम का ‘एक्स-रे’ जब उनकी काली फाइलों पर चलेगा, तो उन्हें भागने के लिए गली तक मयस्सर नहीं होगी।
खबर का असर: तिलमिला उठे ‘समाजसेवी’
हाल ही में जब पत्रकारिता के माध्यम से व्यवस्था के भीतर चल रहे सड़ांध की ओर इशारा किया गया, तो उन लोगों के चेहरे बेनकाब हो गए जो दिन-रात समाजसेवा का चोला ओढ़े रहते हैं। खबर में किसी का नाम नहीं था, लेकिन कहावत है कि ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’। बिना नाम लिए ही बस्ती के कई रसूखदारों को ऐसा महसूस होने लगा कि वे सरेआम नंगे हो गए हैं। अपनी चोरी पकड़े जाने के डर से अब ये लोग पत्रकारों को ‘दलाल’, ‘चोर’ और ‘बेईमान’ बताकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं।हालिया खबरों ने समाज के उन ठेकेदारों की नींद उड़ा दी है जो अब तक खुद को ‘अछूत’ और ‘पवित्र’ समझते थे। बिना किसी का नाम लिए खबर क्या छपी, बस्ती के कुछ ‘नामी’ और ‘बेनामी’ किरदारों के चेहरों के रंग उड़ गए। यह वही लोग हैं जिन्होंने पत्रकार को हमेशा ‘दलाल’ या ‘बदमाश’ की संज्ञा दी है, लेकिन सच तो यह है कि जब-जब इन भ्रष्टाचारियों की गर्दन पर कलम की तलवार लटकती है, इन्हें पत्रकारिता में खोट नजर आने लगती है।
“पत्रकार का मकसद खबर लिखना है, किसी की चाटुकारिता करना नहीं। अगर खबर से किसी को दर्द हो रहा है, तो समझ लीजिए कि तीर सीधे निशाने पर लगा है।”
क्या है ‘लोकआंतो’ का रहस्य?
सूत्रों की मानें तो ‘लोकआंतो’ और ऐसी ही कुछ वेबसाइट्स के जरिए एक बड़ा सिंडिकेट संचालित हो रहा था। इसमें न केवल भ्रष्टाचार और सरकारी धन की लूट शामिल है, बल्कि ‘लड़की सप्लाई’ करने जैसे घिनौने अपराधों के तार भी जुड़े होने की आशंका है। चर्चा आम है कि जिस दिन इस मामले की एफआईआर (FIR) और चार्जशीट के पन्ने खुल गए, उस दिन बस्ती मंडल के कई दिग्गज सलाखों के पीछे होंगे। यही वजह है कि जैसे ही इस फाइल का जिक्र होता है, सत्ता और रसूख के गलियारों में खलबली मच जाती है।सवाल बड़ा है: क्या बस्ती मंडल में ‘लड़की सप्लाई’ करने वाले गिरोहों और ‘लोकआंतो’ जैसे नेटवर्क की फाइलें दबी रहेंगी? पत्रकारिता की मर्यादा का पाठ पढ़ाने वाले ये रसूखदार क्या खुद के गिरेबान में झांकेंगे? करोड़ों डकारने वाले और सरकारी निधि को अपनी जागीर समझने वाले इन ‘लुटेरों’ को अब डर सताने लगा है।
अधिकारी आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन जिले की रग-रग में बसे ये भ्रष्ट तत्व पत्रकार को बदनाम कर अपना रास्ता साफ करना चाहते हैं। लेकिन याद रहे, जिस दिन ‘एफआईआर’ और ‘चार्जशीट’ के पन्ने सार्वजनिक हुए, उस दिन बड़े-बड़े ‘दिग्गज’ भगोड़े नजर आएंगे।
पत्रकारिता पर हमला: आखिर डर किस बात का?
हैरानी की बात यह है कि जो लोग खुद को पाक-साफ बताते हैं, वे पत्रकार की लेखनी से इतने विचलित क्यों हैं? जब एक पत्रकार व्यवस्था के खिलाफ लिखता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जाता है।
“पत्रकार समाज का वह आईना है जो गन्दगी को साफ नहीं करता, बल्कि उसे दिखाता है। अगर चेहरा गंदा है, तो आईना तोड़ने से वह साफ नहीं हो जाएगा।”
बस्ती के कुछ लोग सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर पत्रकारों के परिवार और उनकी मानसिक स्थिति पर टिप्पणी कर रहे हैं। यह उनकी ‘दूषित मानसिकता’ को उजागर करता है। वे भूल रहे हैं कि एक पत्रकार भी इसी समाज का हिस्सा है और वह समाज के हक के लिए ही लड़ता है। सवाल यह है कि जनता के पैसों को हजम करने वाले नेता और दलाल आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं?
प्रशासनिक चुप्पी और रसूखदारों की धमक
अतीत में तत्कालीन जिलाधिकारी (DM) अशोक कुमार सिंह ने कहा था कि “जिस दिन प्रशासन ने कमेंट कर दिया, उस दिन पत्रकार का मकसद हल हो जाएगा।” लेकिन आज स्थिति विपरीत है। पत्रकार जब अपनी कलम चलाता है, तो उसे ‘पैसे के लिए लिखने वाला’ करार दे दिया जाता है। लेकिन जनता पूछ रही है कि करोड़ों की निधि डकारने वाले और समाज को लूटने वाले इन ‘लुटेरों’ पर लगाम कब लगेगी?एक दौर था जब तत्कालीन जिलाधिकारी अशोक कुमार सिंह ने कहा था कि “जिस दिन मैंने कमेंट कर दिया, उस दिन तुम्हारा मकसद हल हो जाएगा।” आज वही स्थिति फिर पैदा हो रही है। पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर सच लिख रहा है, और बदले में उसे गाली, धमकी और मानसिक प्रताड़ना मिल रही है।
- क्या समाज को लूटने वाले नेता और दलाल पवित्र हैं?
- क्या पत्रकार के परिवार और उसकी रोजी-रोटी पर टिप्पणी करना ही इन समाजसेवियों का असली चेहरा है?
- क्या ‘लोकआंतो’ की सच्चाई सामने आने पर ये लोग अपनी नजरें मिला पाएंगे?
सावधान! फाइलें खुलने वाली हैं
लेखनी को दबाने की कोशिशें हजार हो सकती हैं, लेकिन सच को ज्यादा देर तक दफन नहीं रखा जा सकता। ‘लोकआंतो’ वेबसाइट और एप्सटीन फाइल की तरह ही बस्ती की ये फाइलें भी कानून के घेरे में हैं।खबरों को कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है और आगे भी लिखा जाएगा। जो लोग मौत का डर दिखाकर या बदनाम करके पत्रकार की आवाज दबाना चाहते हैं, वे भूल रहे हैं कि कलम की स्याही जब सूखती है, तो इतिहास की गवाही बनती है।
निष्कर्ष: बस्ती मंडल के उन तमाम भ्रष्टाचारियों को यह चेतावनी है—तैयार रहिए, क्योंकि जब ‘लोकआंतो’ और ‘सप्लाई’ के असली आकाओं की फाइलें मेज पर आएंगी, तो आपके पास भागने का भी वक्त नहीं होगा। बस्ती मंडल के उन सभी भ्रष्टाचारियों और अनैतिक कार्यों में लिप्त लोगों को यह लेख एक अंतिम चेतावनी है। आप पत्रकार को गाली दे सकते हैं, उसे बदनाम कर सकते हैं, लेकिन जब कानून का डंडा चलेगा और चार्जशीट के पन्ने गवाही देंगे, तब आपकी तथाकथित ‘इज्जत’ का महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
पत्रकार की कलम नहीं रुकी है और न रुकेगी। कानूनी पहलुओं को नजर में रखकर सच लिखा जा रहा है और आगे भी लिखा जाएगा। भागने के लिए तैयार रहिए!















